अपनी लोक विरासत को बचाने का कर रही हूं प्रयास - मान्या पाण्डेय*

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विंध्य लोकरंग महोत्सव

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*शहडोल एवं रीवा संभाग के 10 जिलों में होगा आयोजन*

*लोकगीत हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं - नरेंद्र*

सतना | उत्थान सामाजिक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक समिति सीधी बघेली बोली बानी के लोक गीतों के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से शहडोल एवं रीवा संभाग के 10 जिलों में ' विंध्य लोकरंग महोत्सव' का आयोजन कर रही है | विंध्य क्षेत्र की लोक कला, लोक संस्कृति और पारंपरिक गीत बचे रहें एवं उनका मंचीय प्रदर्शन देश के विविध मंचो पर होता रहे इसके लिए संस्था आयोजन के साथ साथ भिन्न भिन्न जिलों के लोक कलाकारों का विंध्य लोकरंग सम्मान भी करती है। 

      कार्यक्रम की प्रमुख गायिका मान्या पांडेय पिछले 8 वर्ष से बघेली लोकगीतो का गायन कर रही हैं। मान्या ने बघेली लोक गीतों के गायन की तरफ अपने माता पिता से मिली लोकगीत गायन की विरासत से प्रारंभ किया और आज देश भर के 350 से अधिक मंचों पर बघेली लोक गीतों की प्रस्तुति कर चुकी हैं। 

      मान्या बताती हैं कि उन्हें लगभग 550 बघेली के विविध लोकगीत याद हैं जिनमें संस्कार गीत, ऋतु गीत, यात्रा गीत, श्रम गीत, अनुष्ठानिक गीत, पर्व गीत, जातीय गीत, नृत्य गीत, गाथा एवं कथाओं के विविध गीत शामिल हैं | मान्या बघेली के विलुप्त प्रायः गीतों का गायन करती हैं जिनमें बघेलखंड क्षेत्र में निवासरत भिन्न भिन्न जातियों कुम्हार, बारी, केंवट, अहीर, कोल आदि के गीत शामिल हैं | 

      मान्या को विलुप्त प्रायः गीतों के गायन और विविध मंचो पर बघेली लोक गीतों के प्रदर्शन के लिए संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार, मध्यप्रदेश बोली विकास अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग आदि से सम्मानित भी किया जा चुका है। 

        बघेली लोक गीतों के गायन के संबंध में बात करते हुए मान्या ने बताया कि मैं अपनी दादी नानी की परंपरा को अपनी विरासत समझ कर उसे अपने जीवन में उतार रही हूं और यह प्रयास हम सब को करना चाहिए | हमारी लोक संस्कृति, हमारी बोली हमारी पहचान है। 

         विंध्य लोकरंग महोत्सव के गायक नरेन्द्र सिंह ने कहा कि हमारी बोली के गीत हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं | हमारी गीत, गाथा, कथा एवं हमारी नृत्य परंपराएं हमारे लोक की जीवन शैली का हिस्सा रही हैं दूसरे शब्दों में कहें तो इसी जीवन शैली से उपजी हैं। आजकल हमारी जीवन शैली बहुत तेजी से बदल रही है अतः इन गीतों और अन्य लोक विधाओं का विलुप्त होना लाजिमी है लेकिन हम सब के सामूहिक प्रयास से यह सारी लोक विधाएं यदि मंचीय प्रदर्शन पर आ गईं तो निश्चित रूप यह सभी हमारी अगली पीढ़ी को सुनने देखने को मिल सकती हैं | 

      हमारी लोक की विरासत हमारी अगली पीढ़ी तक पहुंचे इसके लिए हम सब को इन्हे बचाने और इनके मंचीय प्रदर्शन की प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए आने होगा |



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